पंगा लेगा

क्यो नहीं कहते दिल की बात

शहीद भगत सिंह

शहीद भगत सिंह की कुछ दुर्लभ तस्वीरों के दर्शन के लिये यहाँ क्लिक करें।

June 10, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

एक कविता

कोई कपड़ो में गया, कोई तौलिये में गया
हमाम में हर कोई नहाने ही गया।
जिंदगी में जो भी सीखा था अच्छा बुरा,
हमाम में वो गुनगना के ही गया।
घिन आने लगी है जाने में अन्दर,
कोई इतना हमाम को गंदा कर गया
जल रहा था जो बल्ब वो भी साथ ले गया
उसकी नियत में साथ खोट था तभी तो
बल्ब के साथ बो साबुन भी लेकर गया।
खुद तो खूब नहाया हमाम में वो पर
जाते जाते किसी के न नहाने लायक कर गया।
सीना जोरी तो देखिये उसकी आप
जाते जाते कुंडी भी बन्द कर के गया।
शौक से नहाने वालों के वो दुखी कर गया।
और अजीत धुन में कविता लिख गया।

June 10, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

About jatropha जट्रोफा के बारे

जट्रोफा के बारे में जानकारी हेतु यहाँ देखे

To know more about jatropha

http://www.jatrophabiodiesel.org/

June 9, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | , | No Comments Yet

भरोसा जीवन का

क्या भरोसा जीवन का, एक बुलबुला है,
न जाने कब टूट जाये कब तक सलामत है।

यह पंक्तियां कभी किसी साधु महराज के प्रवचन में सुनी थी पर समझ नहीं आयीं. पर शुक्रवार 06.06.2008 की एक घटना ने शायद इसका अर्थ स्वंय ही समझा दिया। मेरे कार्यालय के एक अधिकारी महोदय जो कि कोलकाता से संबधित थे तथा यहाँ कानपुर तैनाथ थे, अपने पुत्र से मिलने कोलकाता जा रहे थे कि कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन पर ह्रदयगति रुक जाने से मृत्यु हो गयी। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि एक दम बिल्कुल ठीकठाक लग रहे थे परन्तु एक दम से गिरे और जब तक कुछ समझ पाये तबतक मृत्यु हो चुकी थी।
<span style=”font-weight:bold;”>क्या जिंदगी इतनी अनिश्चित है?</span>

June 9, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | मल्टी लेवल मार्केटि | , | No Comments Yet

शराफत का चेहरा

शराफत का डंका पीटने वाले का असली चेहराः

<a href=”http://www.aztlan.net/iraqi_women_raped.htm”>देखें</a>

June 3, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | , , | No Comments Yet

जिन्दगी

<a href=”http://ajitkumarmishra.blogspot.com”>जिन्दगी</a>
जिन्दगी हर पल सिखाती रही, पर शायद हम सीख न सके
भुलाने की कोशिस भी बहुत की, पर हम बुरा वक्त भूल न सके
भूलते तो कैसे हम वक्त को, लोग हमको याद दिलाते रहे।
याद भी किया तो किसको, जो हमको हर पल भुलाते रहे।
हम लायक है या नालयक बस इसी सवाल को सुलझाते रहे।
लायक समझके किसी झिड़का, कुल लायक समझ गले लगाते रहे।
कोई कमेन्ट करे न करे बस हमतो दिल की बात लिखते रहे।

May 31, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | जिन्दगी | | No Comments Yet

आम आदमी

किसी के लिए बिछ जाते है,
झुककर धनुष बन जाते हैं।
झूठ मक्कारी का सहारा भी लेते हैं।
इन सब के बदले में कुछ सुविधाऐं लेते हैं।
पर जब कोई हमारे सामने झुककर।
जिंदगी की भीख मांगता है।
गिड़गिड़ता है, पैर पर जाता है।
सुविधायें नहीं जिंदगी मांगता है।
तब नियम-कानून की आड़ लेकर
कैसे उसके सामने अकड़ जाते हैं।
कौन है जो यह सब करता है।
किससे बताये सभी तो यही करते हैं
किस नाम से पुकारोगे इसे
हर पल भेष बदलता है।
कभी डाक्टर तो कभी मास्टर बन जाता है।
कभी वकील तो कभी पत्रकार बन जाता है।
कभी अधिकारी के भेष मे दिख जाता है।
तो कभी चपरासी भी बन जाता है।
इनके धनुष रुप में जो खड़ा नजर आता है।
वह आम आदमी कहलाता है।

April 29, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

धार्मिक स्थल और हमारी आस्था

महोदय, मुझे भी कई बार कलकत्ता जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया और हर बार मैं कालीघाट मंदिर में भी गया परन्तु आप शायद शनिवार के दिन गये होगें इसीलिये इतनी भीड़ मिली। वैसे भक्ति और भीड़ के बीच एक अजब सी कशमकस रहती है। जैसे यदि किसी मंदिर में भीड़ न हो तो यह कहा जाता है कि इस मन्दिर की मान्यता नहीं और भीड़ हो तो कहा जाता कि इतनी भीड़ में दर्शन करने की हिम्मत नहीं।

इसके बाद मैं आता हुँ आस्था पर । किसी वस्तु वैज्ञानिकों ने दो गुड़ बताये है। (1) भौतिक गुण जैसे प्रत्येक पदार्थ छोटे -2 कणो (Particle) से बना है। दूसरा गुण है रासायनिक जिसके माध्यम से यह देखा जाता है कि रासायनिक संरचना कैसी है। मेरे विचार से किसी भी पदार्थ के दो गुण और भी होते है जिसमें पहला गुण दृष्यत्मक गुण अर्थात विभिन्न संयोजन के बाद वह कैसा दिखता है। जैसे शादी विवाह में विजली की सजावट जो कि किसी एक दिशा में चलती हुई प्रतीत होती है जबकि वास्तव में बल्ब केवल जलते बुझते है। इसके बाद जो मेरे विचार से सबसे महत्वपूर्ण गुण है वह है आस्थागत् या भावनात्मक । भावनात्मक गुण की बजह से हर पदार्थ की स्थित और सम्मान हर व्यक्ति के लिए अलग-2 होती जैसे घर अन्दर किसी बुजुर्ग की तस्वीर, कहने को तो वह केवल कागज और विभिन्न रंगो का संजोजन मात्र है परन्तु उस व्यक्ति के मन में उस तस्वीर के प्रति उतना ही सम्मान है जितना कि उस बुजुर्ग के प्रति है। इसी तरह विभिन्न मंदिरो में लगी हुई देवी देवताओं की प्रतीक मूर्तियाँ का यदि आप भौतिक गुण देखेगें तो आपको पत्थर इत्यादि ही दिखेगें परन्तु आस्थागत् तौर आपको उसमें अपने इष्ट ही दिखेगें । अब यह आप पर है कि आप भौतिक दृष्टि से देखते हैं या आध्यत्मिक दृष्टि से।

अंत मे मैं यही कहना चाहता हूँ कि यह मेरे बिल्कुल व्यक्तिगत् विचार है तथा इनका कोई धार्मिक या ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। तथा यदि सहमति ने तो इसको किसी विवाद का विषय न बनाया जाये। साथ यदि किसी की भावनायें आहत हूई हो तो क्षमा चाहता हूँ।

April 11, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

Hello world!

Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start blogging!

July 16, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | 2 Comments

हिप्पेक्रेटों को अपने में जूझने दो, भड़ासी तो अपने आंगन के नाच में मस्त हैं

कमाल है, कुनबा बढ़ता ही जा रहा है, लंबी अनुपस्थिति के लिए मित्रों से क्षमा सहित। अचानक सैर से आया तो देखा कि भड़ास बरगद हो गया है, उसकी शाखाएं…साली बढ़ती ही जा रही हैं। बड़े चिकने-चिकने चेहरे हैं। अधिकांश लोगों के नाम से वाकिफ हूं, चेहरा पहली बार देखा है। मुझ जैसे कुएं में रहने वालों के साथ ऐसा ही होता है। हमारे यहां कुंभ-अर्धकुंभ होता है, यहां भी कुंभ जैसा ही नजारा है। ठेठ सहारनपुरिया रियाज की खरी-खरी। प्रचंड चंडी, अपने ही खोल में सिमटने की कोशिश करता दिनेश, सकुचाता-शरमाता और दारू पीकर बिल्ली से रेप करने को तैयार अरविंद और नारदों पर लाठी ताने यशवंत और उसका एम्सटर्डम संसार। अभिव्यक्ति पर अंकुश नहीं। जो सोचा सो कर लिया। अब साला हाथ में पकड़ने के लिए भी किसी की परमीशन लेनी पड़ेगी। हिप्पेक्रेटों को अपने में जूझने दो। हमें तो जो करना है हम करेंगे। मन हुई तो कविता लिखेंगे। मन हुई तो कपड़ा उतार नाचेंगे। अपने आंगन का नाच है।

आखिर में….
सवाल– क्या आप शादीशुदा है??
जवाब– नहीं, वैसे ही दुखी हूं।

हरिशंकर मिश्रा
इलाहाबाद

June 25, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet