पंगा लेगा

क्यो नहीं कहते दिल की बात

एक कविता

तोड़कर क्राकरी जब महरी आँख दिखाती है
काम छोड़ने को कह कर धमकाती है।
चाय में नमक और सब्जी में चीनी पड़ जाती है
सच कहूँ प्रिये तुम्हारी याद आती है।
सब्जी साबुत रहती है और उंगली कट जाती है।
रोटी कच्ची रहती है और उंगली जल जाती है।
खाना खाने की जगह पेट भर लेता हूँ।
पेन्ट की जगह पजामा पहन लेता हूँ।
सच कहूँ प्रिये तुम्हारी याद आती है।
तुम्हारा लड़ना तुम्हारा झगड़ना।
बात बात पर तुम्हारा अकड़ना।
तुम्हारा मुस्कराना, तुम्हारा प्यार जताना।
जरासी बात पर अपना मुंह फुलाना।
तन्हाई मुझे सब याद दिलाती है।
सच कहूँ प्रिये तुम्हारी याद आती है।

June 13, 2008 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | मल्टी लेवल मार्केटि | , | No Comments Yet