पंगा लेगा

क्यो नहीं कहते दिल की बात

हिप्पेक्रेटों को अपने में जूझने दो, भड़ासी तो अपने आंगन के नाच में मस्त हैं

कमाल है, कुनबा बढ़ता ही जा रहा है, लंबी अनुपस्थिति के लिए मित्रों से क्षमा सहित। अचानक सैर से आया तो देखा कि भड़ास बरगद हो गया है, उसकी शाखाएं…साली बढ़ती ही जा रही हैं। बड़े चिकने-चिकने चेहरे हैं। अधिकांश लोगों के नाम से वाकिफ हूं, चेहरा पहली बार देखा है। मुझ जैसे कुएं में रहने वालों के साथ ऐसा ही होता है। हमारे यहां कुंभ-अर्धकुंभ होता है, यहां भी कुंभ जैसा ही नजारा है। ठेठ सहारनपुरिया रियाज की खरी-खरी। प्रचंड चंडी, अपने ही खोल में सिमटने की कोशिश करता दिनेश, सकुचाता-शरमाता और दारू पीकर बिल्ली से रेप करने को तैयार अरविंद और नारदों पर लाठी ताने यशवंत और उसका एम्सटर्डम संसार। अभिव्यक्ति पर अंकुश नहीं। जो सोचा सो कर लिया। अब साला हाथ में पकड़ने के लिए भी किसी की परमीशन लेनी पड़ेगी। हिप्पेक्रेटों को अपने में जूझने दो। हमें तो जो करना है हम करेंगे। मन हुई तो कविता लिखेंगे। मन हुई तो कपड़ा उतार नाचेंगे। अपने आंगन का नाच है।

आखिर में….
सवाल– क्या आप शादीशुदा है??
जवाब– नहीं, वैसे ही दुखी हूं।

हरिशंकर मिश्रा
इलाहाबाद

June 25, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

हाय हाय मेरी फोटो

सचिन

भडास पर सबके फोटो देखकर मेरा दिल भी कुलबुला उठा । जब यैसे वैसों जाने कैसे कैसों की फोटो लग गई हैं तो सोचा अपन भी टिक लें । सुबह जल्दी उठने की कोशिश की तो पता चला आंखों ने हड़ताल कर रखी है ससुरी खुलिये नहीं रहीं थीं । याद किया तो पता चला रात में ज्यादा देर तक ऑफिस में था । जिन्होंने ऑफिस में देर तक रोका था उनके सम्मान में डेढ दर्ज़न गालियाँ निकालता हुआ में खरामा खरामा स्टूडियो पंहुचा । लेकिन जब फोटो खिंच कर बनी तो होश ड़ गए । वह फोटो पोस्ट करने लायक तो क्या खुद देखने के काबिल भी नहीं थी । फोटोग्राफर से पूछा तो उसने बताया कि नया कैमरा खरीदा है इससे आदमी के भीतरी गुण जैसे होते है वैसी ही फोटो आती है । साले ने पहले पहल मुझसे ही श्रीगणेश किया था । आप लोगो के लिए यह तस्वीर भेज रह हूँ एक तो इस वजह से की उस करामाती कैमरे कि यह पहली तस्वीर है सो एतहासिक हुई दूसरे आप लोग सम्हाल कर फोटो खिचवाना । क्योंकी मेरी तो एक वफादार तस्वीर आई है आप में से कुछ की तो ……………..

June 24, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

शुचिता से मुक्त मस्त लेखन की वाह वाह

पिछले दिनॊं मैं भड़ास से कुछ गायब रहा आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि आप लॊगॊं कॊ मेरी कमी कतई नहीं खली हॊगी ॥ जिसे कमी खल जाए किसी की, वॊ कैसा भड़ासी ॥ वैसे इन दिनॊं मैंने कुछ बंपर बिलागिंग टूल खॊजें हैं थॊड़ा काम और बचा है उसके बाद आपके सामने रखूंगा॥ फिलहाल मेरे पास आपके लिए दॊ खबरें हैं जाहिर है हम मलंगों के लिए दोनों ही अच्छी खबर हैं । क्योंकि अपने लिए तो कुछ बुरा होता ही नहीं है खैर । मसिजीवी ने अपने नए पोस्ट में भडास की तारीफ कुछ इस अंदाज़ में की है— …ये कोई तकनीकी कारीगरी नहीं है लेकिन इस छोटी सी एप्लिकेशन से कई बातें दिखाई देती हैं- मसलन भड़ास को लीजिए – ये भी एक किस्‍म का मोहल्‍ला ही है इसके लिंक रवि के टंबलर पर दिखते हैं ये मस्‍त लेखन है लेकिन नारदीय शुचिता से मुक्‍त (पता नही इसे तारीफ कहें की कमी- फिलहाल बिना मूल्‍य आकलन, ‘वैल्‍यू जजमेंट’ के समझा जाए) है। इस पर रियाज भी हैं ओर अभिषेक भी पहुँच जाते हैं कभी कभी और यशवंत आदि आदि हैं। नारद पर वे चलती फिरती नजर रखते हैं कुछ कुछ फक्‍कड लेखन, पर बांधता है- बेपरवाह है इसलिए कुछ कुछ सच्‍ची ब्‍लॉगिंग जैसा प्रभाव देता है पर भाषा के मामले में सब की ऐसी तैसी करने वाला लेखन है। आज जो मांधाता साहब ने वो सेक्‍स ट्वाय के बहाने से तैं-पैं की है उसके लिए वह किसी बहाने का मोहताज नहीं।….तो इस भड़ास तक हम पहुँच पाते हैं इस नए औजार से। और खुद के पर्सनल व पब्लिक पक्ष के बीच के स्‍क्रेप को पहुँचा देते हैं मतलब ये कि हम लोगों का फक्कड़पना रंग ला रहा है ।
दूसरी बात १४ जुलाई को दिल्ली में ब्लोगर मीट हो रही है । कैफे कोफी डे में । समय है दोपहर १ बजे । जो लोग आ सकें वे अभी से अपने हथियार मांज ले वैसे भाडासियों को इसकी जरूरत है नहीं । ब्लोगर मीट में कुवैत से जीतू भाई के अलावा संजय बेगानी और कई और भी आ रहे हैं । इस मीट में भडास पर चर्चा होने की भी पूरी पूरी सम्भावना है इसे आप आशंका भी कह सकते हैं । खैर जो लोग आना चाहते हैं वे आने जाने का खर्च खुद उठायें । बाकी तरल गरल की जिम्मेदारी यशवंत जी सम्हाल ही लेंगे । तो हो जाओ तैयार गुरू लोगो ब्लोगिन्ग की दुनिया में मचे भडासी तूफान को और तेज़ चला डालो । क्रांतिकारी अभिवादन के साथ ……….. जय भडास

June 24, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

नयी नेकर-बनियान में भडास भैय्या

बात है आजकल बदलाव कि हवा lucknow से लेकर दिल्ली तक बह रही है, पर हमेशा नया करने वाले यशवंत भाई साब भडास को नया नेकर- बनियान पहनाने में थोडा पिछड़ गए , क्योंकि सौरभ जी अपने कम्पुस को पहले ही नायीट-गाउन्न पहना चुके हैं। खैर बात भडास के नए ले -आउट कि हो, मुझे नही लगता कि मैं इतना बड़ा तात्या टोपे हो गया हूँ कि ले-आउट में कमी निकाल पाऊँ ………

अरविंद मिश्रा !!!!!

June 24, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

दुनिया में सब खराब नहीं

यशवंत जी, नया लेआउट अभी तो बहुत पसंद नहीं आया, प्रयोग आगे जरी रख सकते हैं। एक बात..अभी मुझे इस पर लिखने में थोड़ी प्रॉब्लम हो रही है मगर जल्दी ही इसे नियमित करुंगा। वैसे एक छोटा सा फार्मूला मैंने खोज लिया है, जल्दी ही धुँआधार लिखने कि position में आ जाऊंगा। वैसे सुमन सौरभ जी के campus के बारे में आप का कमेन्ट दिलचस्प लगा। मगर आप बहुत nihalist और misanthropist टैप के जीव हैं। इतना nigative thoughts नहीं होना चाहिए। इतनी nigative enrgy, इतना ग़ुस्सा आपके अपने क्रियेटिव काम को और बेहतर बनाने में लगाया जा सकता है। दुनिया में सब कुछ खराब ही नहीं अच्छा भी है। campus में आपके कमेंट से ही आपकी cretivity सामने आती है, तो ग़ुस्सा कुछ ऐसा करें जो Albert Pinto जैसा हो।

June 24, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

नया लेआउट………कैसा रहा???

भड़ास प्रयोग के दौर में है, इसी कड़ी में इसका नया लेआउट डिजायन किया गया है। कैसा लगा? जरूर बताइए। साथ में अपनी भड़ास प्रेषित करते रहिए।
यशवंत

June 24, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

वरुण छोटा भाई और विनोद को बधाई, दादा से वादाखिलाफी

दादा को ढेर सारी भड़ास
ये क्या दादा ये वरुण प्रताप तो अपना छोटा भाई निकला और आप हैं कि यह भी नहीं जानते कि अड़ोस प़ड़ोस में कौन बसा है। खैर छोटे भाई को बताना चाहूंगा कि खटमलगिरी की भड़ास उन पर नहीं थी। ये प्रकरण ठीक वैसा ही है जैसे घोड़े के खुर में नाल ठुक रही थी और मेंढकी ने भी पांव आगे कर दिया कि मेरे भी ठोको। फिर भी वरुण की सहज अभिव्यक्ति की सराहना। शाबास, इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। लगे रहना मेरे भाई, यूं ही। कभी हमें भी पड़ी लकड़ी लेने की आदत थी। जबसे पता चला कि सबसे महंगी लकड़ी यही होती है, तबसे सुधर गये। मगर हौसला नहीं छोड़ा। वरुण एक बात बहुत अच्छी हुई कि आपने अपनी पहचान जल्द खोल दी। वर्ना हम और दादा तो समझ बैठे थे कि कोई घुसपैठिया है।

विनोद सिंह! क्या कहने, बढ़िया है भाई
दूसरे छोटे भाई विनोद सिंह का दूसरा रूप देखा। सुना तो कई बार था इन्हें। मगर, इन्होंने अपनी आस्तीन में एक शायर भी पाल रखा है, इसका खुलासा ब्लॉग देखकर हुआ। विनोद की शायरी की जो झलक भड़ास पर है, उसमें एक बात तो बहुत साफ है कि इनकी नब्ज पर पकड़ है। जरूरत सिर्फ इतनी भर है कि इन्हें तराशने वाला कोई अच्छा उस्ताद मिल जाए तो शायरी की मामूली तकनीकी चीजें दुरुस्त हो जाएंगी। करंट मुद्दों, खासकर सियासत और सामाजिक विद्वेष को निशाना बनाकर शायरी करोगे तो बहुत मज़ा आएगा।

दादा की टीआरपी का राज़?
भई दादा यशवंत ने लिखा है कि एमस्टर्डम के वर्ल्ड सेक्स म्यूजियम की तस्वीरों के चक्कर में अपने ब्लॉग की टीआरपी बढ़ गई है। दादा अगर ऐसी बात है तो मैं आपको हर रोज़ जीवंत तस्वीरें जुटाने का फार्मूला बता सकता हूं। बहरहाल, यह भड़ास के हित में नहीं होगा। तस्वीरें डलनी चाहिएं लेकिन उनसे भी भड़ास निकलती दिखनी चाहिए। ये तस्वीरें नीली, काली या मल्टीकलर कैसी भी हों, इस पर कोई बहस नहीं है। कहने का मकसद ये है कि हम भड़ास की मूल वैचारिक धारा से भटकें नहीं।

फिर मिलते हैं
फिर मिलने की उम्मीद के साथ
क्रांतिकारी भड़ासीय अभिवादन

June 23, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

सौरभ सुमन जी, कैंपस में कहां हैं जवानी के जोरदार किस्से???

अपने मित्र हैं सौरभ सुमन। दिल्ली से कानपुर और अब लखनऊ में हैं। बेहद शर्मीले, सजीले और नजाकत-नफासत पसंद। मुझे वो अच्छे लगते हैं क्योंकि उनमें एक अच्छे नागरिक के सभी गुण हैं। उनकी विनम्रता औरों की तरह कतई नकली नहीं है, पूरी तरह प्राकृतिक है। उनके चाहने के पीछे शायद एक ग्रंथि यही है कि अच्छे लोग बहुत कम हैं और जो भी हैं उन्हें संभाल कर रखने का दायित्व हम सभी पर है। खैर, कहना कुछ चाह रहा था, कह कुछ और रहा हूं। मुझे पता है, तारीफ सुन के सौरभ के दिमाग खराब नहीं होते।
तो मैं कह रहा था, सौरभ भाई ने एक ब्लाग बनाया हुआ है कैंपस। उसका लिंक मैंने भड़ास पर दे रखा है। कैंपस की दुकान चलाने के लिए सौरभ जी भरपूर कोशिश कर रहे हैं। हां, एक बात और, सौरभ जी कुछ किशन-कन्हैया की तरह हैं, उन्हें लड़कियां बेहद चाहती हैं और वो लड़कियों को। हालांकि ये गुण अपन सब में भी हैं लेकिन अपन लोग हैं बेहद आक्रामक। जल्दी दोस्ती होती है और उससे ही जल्दी टूट भी जाती है। खैर, बात कर रहा था सौरभ जी की। तो, सौरभ जी का कैंपस चल निकला है। उसमें कई लोग अपनी कैंपस की यादें निकाल रहे हैं। कुछ निकालने का नाटक कर रहे हैं और कुछ जबरन निकालने की कोशिश कर रहे हैं। भई, इतना प्रायोजित लेखन नहीं चलेगा। कैंपस के दिनों में हर आदमी ढेर सारा हरामीपना करता है और यह हरामीपना ही जवानी जिंदाबाद के नारे को बुलंद करती है। अगर इन हरामीपनों का जिक्र नहीं किया जाए तो कैसा कैंपस? मेरा मकसद कैंपस की आलोचना करना नहीं बल्कि उसका वास्तविक विजन बताना है। हो सकता हूं मैं गलत हूं क्योंकि दरअसल मैं अपने तरीके से सोच रहा हूं, सौरभ जी की सोच कुछ और होगी। लेकिन मुझे लगता है कि जब मैं कैंपस में लिखूंगा तो वो सारे कच्चे चिट्ठे खोलूंगा जिसे शायद कैंपस के दिनों में बिलकुल नहीं खोल सकता था। उसमें मास्टर को मारने से लेकर और ट्रेन में बिना टिकट पकड़े जाने पर उठक-बैठक करने तक का जिक्र होगा। इसी तरह पड़ोस की शादीशुदा लड़की पटाने के लिए कई महीने बर्बाद करने और फिर हाथ में कुछ न आने की भयंकर निराशा का भी जिक्र करूंगा। किस तरह नशे का गिरफ्त में आया, कैसे राजनीति में पहुंचा, कैसे थिएटर में शामिल हुआ, कैसे सेक्स को लेकर कुंठित होता गया, किस तरह प्रेम और यर्थाथ के बीच भयंकर गैप ने आदर्शवादी मन को कठोर बनाया…..

डार्क एरियाज के राज खोलने जरूरी हैं
भई, लिखना-लिखवाना है तो असल बातों पर ले आओ सबको क्योंकि आदमी बहुत कमीना टाइप प्राणी होता है, वो हमेशा अपनी मूर्ति पूजा कराना चाहता है जबकि सबके जीवन में इतने डार्क एरियाज होते हैं कि उसके राज जाहिर करने में सबकी फटती रहती है। हालांकि ऐसा लगता है कि राज जाहिर होने पर भयंकर हो जाएगा लेकिन हर आदमी के जीवन में ऐसे ही राज हैं और किसी के पास फुर्सत नहीं कि वो आपके राज को लेकर बैठ जाए और आपको फांसी पर लटका दे। मुझे याद है, जब पहली बार मुझे अपने जवान होने का अनुभव हुआ था, उस समय मैं हाई स्कूल में था, तब मैं कई दिन बेहद सदमें में रहा। किसी से नजर मिलाने की हिम्मत नहीं होती थी। लगता था धरती फट जाए और मैं समा जाऊं। यह क्या हो रहा है। सोचने समझने की हिम्मत जवाब दे गई थी। मुझे लगता रहा, यह सिर्फ मेरे साथ हुआ। पर बाद में जब थोड़ा रीयलिस्टिक हुआ तो पता चला, अबे सभी लोग थोड़ा इधर-उधर कम-ज्यादा कर ऐसा ही अनुभव करते हैं। ऐसा ही लड़कियों के साथ भी होता है। रियाज भाई के जीवन के डार्क एरियाज तो ऐसे-ऐसे हैं कि जब वो सुनाने लगेंगे तो कई लोग बेहोश हो जाएंगे। खुदा उन्हें चुप ही रखे। इसी तरह अपने सौरभ शर्मा मेरठ वाले ने बचपन से ज्योंही जवानी में कदम रखा तो रजिया गुंडों के जाल में फंस गई। वो लंबा किस्सा है जिसे सौरभ शर्मा जी कभी-कभी कान में फूंक मार कर सुनाते हैं और कहते हैं कि भाई साहब किसी से कहना नहीं। …तो ऐसे ही ढेर सारे किस्से हैं जिसे हम किसी से कहना नहीं चाहते लेकिन उन्हें कह-लिख देने पर कहीं कुछ नहीं होता क्योंकि इतनी फास्ट दुनिया में लोग आपके किस्से को लेकर थोड़े ही बैठे रहेंगे।

बाकी बातें बाद में…कैंपस में इंतजार करूंगा किसी मास्टर को मारे जाने की घटना का, किसी लड़की को पटाने के लाइव चित्रण का, किसी की किताब चुराने, किसी की रैगिंग लेने की लाइव रिपोर्टिंग का…
सौरभ जी….भड़ास निकालिए, कैंपस में ही सही, लेकिन ओरीजनल अंदाज में। गुडी-गुडी लिखवाएंगे तो सब यूं ही थैंक्यू थैंक्यू लिखकर चले जाएंगे।

किसी को कुछ बुरा लगा हो तो वो एक बार जोर से बोले...जय भड़ास

यशवंत

June 23, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

अपुन की बुराइयां भी ढेर सारे लोगों की अच्छाइयों पर भारी है…एक मजेदार चीनी कहानी

यह एक चीनी कहानी है जो जिसे मैने पढ़ने के बाद काफी इंज्वाय किया। लगा, आप सबको पढ़ाना चाहिए। मुझे पढ़ाने का श्रेय जाता है अपने बड़े भाई आलोक सांवल जी को। उन्होंने ही मेल पर भेजा था। थैंक्स।
कहानी मानवीय गुणों और अवगुणों के बारे में एक नई दृष्टि देती है। कई बार हमारे अवगुण गुणों पर भारी पड़ जाते हैं। हमारे जो भी गुणृ-अवगुण हैं, उनमें ढेर सारी सकारात्मक बातें होती हैं, बस जरूरत है ऐसी दृष्टि रखने की जिससे अपनी सकारात्मकता और अच्छाइयां दिन-ब-दिन और बढ़ें। उम्मीद है, आप सभी को पसंद आएगी….थोड़ी लंबी है, लेकिन है मजेदार, ध्यान से और धैर्य से पढ़िएगा….

An elderly Chinese woman had two large pots, each hung on the ends of
a pole which she carried across her neck.
One of the pots had a crack in it while the other pot was perfect and
always delivered a full portion of water.
At the end of the long walks from the stream to the house, the cracked
pot arrived only half full.
For two years this went on daily, with the woman bringing home only
one and a half pots of water
Of course, the perfect pot was proud of its accomplishments.
But the poor cracked pot was ashamed of its own imperfection, and
miserable that it could only do half of what it had been made to do.
After two years of what it perceived to be bitter failure, it spoke to
the woman one day by the stream.
“I am ashamed of myself, because this crack in my side causes water to
leak out all the way back to your house.”
The old woman smiled, “Did you notice that there are flowers on your
side of the path, but not on the other pot’s side?”
“That’s because I have always known about your flaw, so I planted
flower seeds on your side of the path, and every day while we walk
back, you water them.”
“For two years I have been able to pick these beautiful flowers to
decorate the table.
Without you being just the way you are, there would not be this beauty
to grace the house.”
Each of us has our own unique flaw. But it’s the cracks and flaws we
each have that make our lives together so very interesting and
rewarding.
You’ve just got to take each person for what they are and look for the
good in them.

कैसी लगी…???

और हां, अरविंद मिश्रा को बधाई, भाई ने लगाने के बाद भड़ास पे भड़ास निकाली और वो भी मेरे पर। सर से भाई साहब बनाने का ऐलान कर डाला। आगे देखते हैं, अगली बार लगाने के बाद क्या बनाता है। खैर, बधाई, उम्मीद है भड़ास यूं ही निकलता रहेगी और जिंदगी का चमन गुलजार होता रहेगा।

वरुण भाई, आप मेरे बगल में जनरल डेस्क पर काम करते हो तो प्लीज, एक बार दर्शन तो दे दो। हो सकता है हम लोग गलत हों, लेकिन बस अंदाजे पर तीर मार दिया था। अगर आप अपनी फोटो मेल से भेज दें तो सारे भड़ासी आपकी शक्ल देख लेंगे। मुझे तो हार्दिक प्रसन्नता होगी ही। उम्मीद है, भड़ास पर हुई नोक-झोंक का कोई बुरा नहीं मानेगा। यही तो लाइफ है मेरी जान…।

यशवंत

June 23, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet

aise hi jawab ki ummeed thi

sabse pahle yah saaf karana chahoonga ki main kisi chhadma nam se nahi likh raha.( yashwant sir, main aap ke pados mein general desk per kaam karata hoon). madira ke labh aur amesterdam ki tasveerein shandar rahin.badhai. per, bahas ki gunjaish bhi hai. khair, r ji se aise hi jawab ki ummeed thi. apnee soch aur mansikata ki badhiya numaish ki aapne. vaise bhi aap jaise logon ke liye isase upar sochana thoda mushkil hota hai, banispat bhashan dene ke. kyon. apni pasand ke barein mein duniya ko batana achcha raha.per, mujhe salaah dene se behtar hoga, aise log in nuskhon per khud amal karein, shayad kiya bhi ho, tabhi itnee variety ke barei mein janate hain aur garv se bata rahe hain. sochiye aur fir bhadas nikaliye.per is bar, unhike shabdon mein, sandas mat karna. chhota bhai hi samajhana.
jai bhadas
varun pratap singh

June 23, 2007 Posted by अजीत कुमार मिश्रा | Uncategorized | | No Comments Yet